भोरमदेव मंदिर: 1000 साल पुराना इतिहास और धार्मिक महत्व जानें

भोरमदेव मंदिर रायपुर से लगभग 125 किलोमिटर तथा कबीरधाम से 18 किलोमिटर दूर चौरागाँव में स्थित है इस ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में फणीनागवंशी वंश के राजा गोपाल देव ने काराया था इस मंदिर का अनुठी शिल्प कला और कामोत्तेजक मूर्तियां खजुराहो का याद दिलाता जिसके कारण इस मंदिर को छत्त्ीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।

भोरमदेव मंदिर हजारो वर्ष पुराना है और भगवान शिव को समर्पित है इस मंदिर के पास एक तलाग भी स्थित है जिसमे आस-पास के पहाड़ों से पानी बह कर आता है यह मंदिर नागर शैली का एक सुंदर उदाहरण है। इस मंदिर का मुख पूर्व की ओर है। मंदिर में तीन तरफ से प्रवेश किया जा सकता है। यह मंदिर पाँच फीट ऊँचे चबूतरे पर बना है। तीनों प्रवेश द्वारों से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश किया जा सकता है। मंडप की लंबाई 60 फीट और चौड़ाई 40 फीट है।

भोरमदेव मंदिर चारो तरफ से पहाड़ो एवं जंगलो से घिरा यह मंदिर पर्यटकों को मंत्रमुक्त कर देता है इस मंदिर से पास कि पहाड़ी पर माता रानी का मंदिर भी स्थिापित है जहां तक जाने के लिए आपको 100 से 120 सिड़ि को चढ़ना पड़ेगा।

भोरमदेव मंदिर मंदिर शिव भगतो का आस्था का केन्द्र भी है। सावन के महिने में शिवभक्त दुर दुर से कांवण में जल ले कर भगवान शिव को अर्पित करने आते है इस महिने में यह स्थल पर्यटकों से भरा रहता है

भोरमदेव महोत्सव

कबीरधाम प्रशासन के द्वारा याहाँ पर हर वर्ष भोरमदेव महोत्सव का आयोजन किया जाता है यह महोत्सव मार्च के महिने मे होली के 20 दिन बाद होता है आमतौर पर यह 2से 3 दिन तक चलता है देखने दुर-दुर से लोग आते है।

मड़वा महल

मंडवा महल जिसका प्राचिन नाम दूल्हा देव कहा जाता था, जिसे अब मारवा या मंडवा महल के नाम से भी जाना जाता है, यह नाम ग्रामीणों द्वारा दिए गए लोकप्रिय नाम ही प्रचलित हो गए हैं। फूलों से सजे उस खुले शेड ज़्यादातर त्योहारों, और खासकर शादी-ब्याह के मौकों पर बनाया जाता है जिससे ग्रामिणों में मडवा महल नाम प्रचलन में आ गया यह भोरमदेव शिव मंदिर के पूर्व मे लगभग आधा किलोमिटर पर स्थित है इस मंदिर का मंडप की छत चौकोर खंभों की चार कतारों पर टिकी है। ये खंभे 15 इंच चौकोर हैं और इन पर कुछ साधारण मोल्डिंग तो है, लेकिन किसी भी तरह की नक्काशी नहीं है। यह मंदिर प्राचिन होने के कारण पुरात्तव विभाग के संरक्षण में है।

इस मंदिर का इतिहास काफि पुराना है इस मंदिर के पास फणीनागवंशी वंश के शिला लेख भी प्राप्त हुए है अगर आपको इसके इतिहास के बारे मे विस्तृत जानकारी जानना है तो आप छत्तीसगढ़ मित्र का यह लेख पढ़ सकते है।

छवि स्रोत: जिला प्रशासन कबीरधाम (छत्तीसगढ़)

चेर्कि महल

यह महल मणवा महल से लगभग आधा किलोमिटर में स्थित है यह मंदिर भी भोरमदेव के मंदिरो की तरह भगवान को समर्पित है इसकि बनावट नागर शैली की प्रतित होती है इस मंदिर का निमार्ण 14 वीं शताब्दि के समय का है। इस मंदिर के बाहरी भाग में किसी भी प्रकार का चित्र नहीं है जैसे बांकी दो मंदिरो में है।

छवि स्रोत: जिला प्रशासन कबीरधाम (छत्तीसगढ़)

भोरमदेव आने वाले पर्यटक याहाँ पे स्थापित तीनो मंरिदो का दर्शन करते है। घने जंगलो के बिच यह स्थान प्राकृतिक शांति प्रदान करता है। साथ ही मंदिर के पास से चिल्फी घाटी तक जाने के लिए भी रास्ता है जहाँ बीच में वीव्ह पॉइंट भी बना हुआ है जहाँ से आप घने जंगल और ऊचे पहाड़ीयो को देख सकते है।

हाल ही के दिनो मे छत्तीसगढ़ सरकार ने यहाँ भोरमदेव अभ्यारण का भी शुभारंभ किया है। जो कालाआमा गेट से प्रारंभ होता है जिसको देखने के लिए निर्धारित शुल्क में आपको अभ्यारण घुमाया जाएगा। सरकार ने इस प्राचिन धरोहर को संजोएंे रखने के लिए 146 करोड़ की लागत से भोरमदेव कोरिडोर का निर्माण भी किया जा रहा है।

आप हमारे दुसरे ब्लॉग जो कबीरधाम के झरनों के बारे में है उसे भी पढ़ सकते है- रानीदहरा-वॉटरफॉल

भोरमदेव मंदिर कहाँ स्थित है।

यह छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के चौरागाँव में स्थित है।

भोरमदेव मंदिर का निर्माण किसने काराया था ?

भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में फणीनागवंशी वंश के राजा गोपाल देव ने काराया था

चेर्कि महल कहाँ पर स्थित है ?

यह महल मणवा महल से लगभग आधा किलोमिटर में स्थित है

Author Profile

Sunil033
Sunil033Sunil
Hello! My name is Sunil Kumar based in Chhattisgarh. I enjoy blogging, exploring new digital ideas, and creating valuable content. Welcome to my website, where I share engaging and informative updates

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *